गोरी ने की थी शुरुआत, जिन्ना ने दिया था कानूनी शक्ल
वक्फ की हरकतों और हकीकतों से वाकिफ होना जरूरी
गोरी और जिन्ना का पाप : झेल रहा था भारत
शुभ-लाभ विमर्श
दो गांवों से शुरू हुआ वक्फ आज 9.4 लाख एकड़ तक पहुंच गया है। इसमें 8.7 लाख से ज्यादा सम्पत्तियां शामिल हैं। मस्जिदें, दरगाहें, कब्रिस्तान और इमामबाड़े इसके बड़े हिस्से हैं। यहां तक कि सरकारी जमीनें, इमारतें, गांव के गांव, पुरातात्विक महत्व के स्थान, हिंदू मंदिर भी वक्फ सम्पत्ति के दावे में हैं। तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में 70 साल के किसान राजगोपाल अपनी बेटी की शादी के लिए अपनी 1.2 एकड़ जमीन बेचने की तैयारी कर रहे थे। सपने संजोए हुए थे कि बेटी का हाथ पीले करके उसे विदा करेंगे। लेकिन जब वे सब-रजिस्ट्रार ऑफिस पहुंचे, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें 20 पन्नों का एक दस्तावेज थमाया गया, जिसमें लिखा था कि उनकी जमीन तमिलनाडु वक्फ बोर्ड की है। सिर्फ उनकी जमीन ही नहीं, बल्कि उनका पूरा गांव तिरुचेन्थुरई, जहां 1500 साल पुराना सुंदरेश्वरार मंदिर भी है, सभी को वक्फ की सम्पत्ति बता दिया गया। गांव वाले हैरान थे, गुस्से में थे और डरे हुए भी। यह खबर जंगल की आग की तरह फैली और पूरे देश में वक्फ कानून पर बहस छिड़ गई। यह कोई अकेला मामला नहीं था। आसपास के 18 और गांवों को भी वक्फ की सम्पत्ति घोषित कर दिया गया। लोग सवाल उठाने लगे कि आखिर यह वक्फ बोर्ड है क्या, जिसके पास आज 9.4 लाख एकड़ जमीन है? यह करीब 3,804 वर्ग किलोमीटर का इलाका है, जो भारतीय रेलवे और भारतीय सेना के बाद देश का सबसे बड़ा जमींदार माना जाता है।
इसकी शुरुआत 12वीं सदी में दो गांवों के दान से हुई थी, और आज यह एक विशाल साम्राज्य बन चुका है। केंद्र सरकार अब वक्फ संशोधन विधेयक ला रही है। ऐसे में चलते हैं वक्फ की जड़ों तक, और समझते हैं कि वक्फ क्या है, भारत में कैसे आया और आज क्यों विवादों में है। वक्फ अरबी शब्द वकुफा से आया है, जिसका मतलब है ठहरना या रोकना। इस्लाम में वक्फ का अर्थ है ऐसी सम्पत्ति जो जन-कल्याण के लिए दान की जाए। इसे एक तरह का स्थायी दान कह सकते हैं, जिसे न बेचा जा सकता है, न उपहार में दिया जा सकता है, और न ही विरासत में हस्तांतरित किया जा सकता है। जो इसे दान करता है, उसे वाकिफ कहते हैं। वाकिफ यह भी तय कर सकता है कि उसकी सम्पत्ति या उससे होने वाली कमाई का इस्तेमाल किस काम के लिए होगा। मिसाल के तौर पर, अगर कोई कहे कि उसकी जमीन से होने वाली कमाई सिर्फ अनाथ बच्चों की पढ़ाई पर खर्च हो, तो ऐसा ही होगा।
इस्लाम में वक्फ की शुरुआत पैगंबर मोहम्मद के समय से मानी जाती है। एक कहानी है कि खलीफा उमर ने खैबर में एक जमीन हासिल की और पैगंबर से पूछा कि इसका सबसे अच्छा इस्तेमाल क्या हो सकता है। पैगंबर ने कहा, इसे रोक लो, बांध लो, और इससे होने वाला फायदा लोगों की जरूरतों पर खर्च करो। इसी तरह, मदीना में 600 खजूर के पेड़ों का एक बाग वक्फ किया गया था, जिसकी कमाई से गरीबों की मदद होती थी। यह वक्फ के सबसे पुराने उदाहरणों में से एक है।
भारत में वक्फ की कहानी इस्लाम के साथ शुरू होती है। इस्लामिक परंपरा के महत्वपूर्ण हिस्से वक्फ की भारत में सैकड़ों सालों से मौजूदगी है। इसका मतलब है ऐसी सम्पत्ति को जन-कल्याण के लिए दान करना, जिसे न बेचा जा सके, न उपहार में दिया जा सके, और न ही किसी को विरासत में हस्तांतरित किया जा सके। भारत में इसकी शुरुआत इस्लाम के आगमन से मानी जाती है, जो 7वीं सदी में अरब व्यापारियों के साथ शुरू हुई। लेकिन इसे शासकीय स्तर पर लागू करने की कहानी 12वीं सदी से शुरू होती है, जब मोहम्मद गोरी ने पहला कदम उठाया। इसके बाद कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, मुगल शासकों, ब्रिटिश काल और 20वीं सदी में मोहम्मद अली जिन्ना से जुड़े मुस्लिम वक्फ एक्ट तक यह परंपरा विकसित होती रही। आइए, इसकी पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं।
भारत में वक्फ की औपचारिक शुरुआत का श्रेय अक्सर अफगानी आक्रमणकारी और लुटेरे शासक मोहम्मद गोरी को दिया जाता है। गोरी अफगानिस्तान के घोर प्रांत से आया एक तुर्की शासक था, जिसने 12वीं सदी के अंत में भारत पर कई हमले किए। 1175 में उसने मुल्तान के इस्माइली शासक को हराया और 1192 में तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को हराकर दिल्ली और उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा किया। गोरी का मकसद सिर्फ सत्ता हासिल करना नहीं था, बल्कि इस्लामी संस्थानों को मजबूत करना भी था।
इतिहासकार विपुल सिंह की किताब इंटरप्रेटिंग मेडिएवल इंडिया और अयनुल मुल्क मुल्तानी की फारसी किताब इन्शा-ए-मेहरु के अनुसार, गोरी ने 1185 में मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गांव दान में दिए। इन गांवों का मैनेजमेंट शेख-अल-इस्लाम को सौंपा गया, जो उस समय एक प्रमुख मजहबी नेता की उपाधि थी। यह भारत में वक्फ का पहला दर्ज उदाहरण माना जाता है। गोरी का यह कदम धार्मिक और सामुदायिक कल्याण के लिए था, ताकि मस्जिद की देखभाल और मुसलमानों की शिक्षा के लिए संसाधन जुटाए जा सकें। हालांकि, कुछ वामपंथी इतिहासकार जैसे प्रोफेसर इरफान हबीब मानते हैं कि वक्फ की अवधारणा इससे पहले भी व्यक्तिगत स्तर पर मौजूद थी, लेकिन गोरी ने इसे शासकीय पहचान दी। इन दो गांवों से शुरू हुई यह परंपरा आगे चलकर लाखों एकड़ तक फैल गई। गोरी की मृत्यु 1206 में हुई, लेकिन उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाया।
मोहम्मद गोरी का गुलाम और सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक साल 1206 में दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान बना। उसने 1206 से 1210 तक शासन किया और भारत में इस्लामी शासन की नींव रखी। ऐबक के दौर में वक्फ को औपचारिक रूप से लागू करने का कोई स्पष्ट दस्तावेज नहीं मिलता, लेकिन उसने इस्लामिक परंपराओं को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए, जो वक्फ के विकास में मददगार साबित हुए। ऐबक ने दिल्ली में कुतुब मीनार और कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद की नींव रखी। ये मजहबी स्थल बाद में वक्फ सम्पत्तियों का हिस्सा बने। इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी की किताब तारीख-ए-फिरोज शाही के मुताबिक, उस दौर में शासक अक्सर मस्जिदों और मदरसों के लिए जमीनें दान करते थे। ऐबक का शासन छोटा था, लेकिन उसने इस्लामी कानूनों को लागू करने की शुरुआत की, जिसने वक्फ को मजबूत करने का रास्ता खोला। उसकी मृत्यु के बाद उसका दामाद इल्तुतमिश सत्ता में आया, जिसने वक्फ को और व्यवस्थित किया।
दिल्ली सल्तनत का तीसरा सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश 1211 से 1236 तक शासक रहा। उसे भारत में इस्लामी शासन को मजबूत करने वाला पहला शासक माना जाता है। इल्तुतमिश ने न सिर्फ सल्तनत को संगठित किया, बल्कि इस्लामी कानूनों और परंपराओं को व्यवस्थित करने में भी अहम भूमिका निभाई। वक्फ इसकी एक बड़ी मिसाल है। इल्तुतमिश के शासन में मस्जिदों, मदरसों और अन्य मजहबी कार्यों के लिए सम्पत्तियां दान करने की प्रथा बढ़ी। बदायूं में शम्सी मस्जिद, जिसका निर्माण उसके शासनकाल में हुआ, एक वक्फ सम्पत्ति का उदाहरण है। इतिहासकार बताते हैं कि इल्तुतमिश ने वक्फ सम्पत्तियों के प्रबंधन के लिए स्थानीय स्तर पर कमेटियां बनाईं, जिन्हें मुतवल्ली कहा जाता था। ये कमेटियां सम्पत्ति की देखभाल और उससे होने वाली आय को जन-कल्याण में लगाने का काम करती थीं। इल्तुतमिश के दौर में ज्यादातर सम्पत्ति शासकों के पास होती थी, इसलिए वे ही वाकिफ (दानदाता) बनते थे।
उसकी बनाई मस्जिदें और मदरसे वक्फ के तहत संरक्षित किए गए। विद्वान अमीर अफाक अहमद फैजी के मुताबिक, बदायूं में मिरान मुलहिम की कब्र और बिलग्राम में ख्वाजा मजद अल-दीन का मकबरा भी इल्तुतमिश के समय की वक्फ सम्पत्तियों के उदाहरण हैं। इल्तुतमिश ने वक्फ को एक संस्थागत रूप दिया, जो बाद के शासकों के लिए आधार बना। मुगल काल में वक्फ ने नया आयाम लिया। बाबर (1526-1530) ने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई जीतकर मुगल साम्राज्य की नींव रखी। उसके बाद हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां
अकबर (1556-1605): अकबर ने वक्फ को व्यापक रूप दिया। उसने लखनऊ में फरांगी महल को वक्फ किया, जो एक बड़ा इस्लामिक शिक्षण केंद्र बना। अकबर ने मजहबी कार्यों के लिए जमीनें दान कीं और वक्फ के प्रबंधन को मजबूत करने के लिए नियम बनाए। शाहजहां (1628-1658): शाहजहां ने ताजमहल के रखरखाव के लिए 30 गांव और एक परगना वक्फ में दिया। विद्वान अमीर अफाक अहमद फैजी लिखते हैं कि यह मुगल काल में वक्फ का सबसे बड़ा उदाहरण था। शाहजहां ने दिल्ली में जामा मस्जिद भी बनवाई, जो वक्फ सम्पत्ति का हिस्सा बनी। औरंगजेब (1658-1707): औरंगजेब ने भी वक्फ को बढ़ावा दिया, लेकिन उसका फोकस मजहबी कार्यों पर ज्यादा था। उसने कई मस्जिदों और कब्रिस्तानों के लिए जमीनें दान की। मुगल काल में वक्फ सम्पत्तियों की संख्या तेजी से बढ़ी। शासकों के अलावा आम लोग भी अपनी जमीनें दान करने लगे। ग्रामीण इलाकों में मुस्लिम समुदाय के फैलने और धर्म परिवर्तन के साथ वक्फ का दायरा बढ़ता गया।
ब्रिटिश शासन में वक्फ को कानूनी और संगठित रूप मिला। उससे पहले यह व्यक्तिगत और समुदाय स्तर पर चलता था। प्रोफेसर इरफान हबीब बताते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने वक्फ को नियंत्रित करने की कोशिश की, ताकि उसकी सम्पत्तियों का प्रबंधन व्यवस्थित हो सके। साल 1913 में वक्फ बोर्ड की शुरुआत: 1913 में ब्रिटिश सरकार ने मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट पारित किया। इसका मकसद वक्फ सम्पत्तियों की निगरानी करना और उनके दुरुपयोग को रोकना था। यह पहला मौका था जब वक्फ को सरकारी स्तर पर मान्यता मिली। साल 1923 का वक्फ एक्ट: 5 अगस्त 1923 को मुसलमान वक्फ एक्ट 1923 लाया गया, जिसने वक्फ को कानूनी आधार दिया। इस एक्ट के तहत वक्फ सम्पत्तियों का रजिस्ट्रेशन और प्रबंधन शुरू हुआ। बोर्ड बनाए गए, जिनमें समुदाय के लोग और सरकार के प्रतिनिधि शामिल थे।
हबीब कहते हैं, ब्रिटिश काल में जमींदार और नवाब अपनी अतिरिक्त सम्पत्तियां दान कर दिया करते थे। यह प्रथा पहले से थी, लेकिन इसे संगठित करने की कोशिश ब्रिटिश सरकार ने की। इस दौर में वक्फ की सम्पत्तियां मस्जिदों, कब्रिस्तानों और मदरसों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि इसमें नकदी और इमारतें भी शामिल हुईं। केंद्र सरकार वक्फ संशोधन बिल लोकसभा में लाई। इसे लेकर सरकार और विपक्ष में जमकर रस्साकशी चली। इसी बीच बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने मोहम्मद अली जिन्ना का जिक्र छेड़ दिया। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, 1911 में जिन्ना मुस्लिम वक्फ एक्ट लेकर आए थे, और 1954 तक इसे जिन्ना लॉ के नाम से जाना जाता था। हिंदुओं और मुसलमानों के अलग-अलग कानूनों ने इस देश में विभाजन को जन्म दिया। तो आखिर क्या है ये जिन्ना का मुस्लिम वक्फ एक्ट? ये भी समझ लेते हैं।
मोहम्मद अली जिन्ना 20वीं सदी की शुरुआत में कांग्रेस का नेता था। वो एक बड़ा वकील था और उस समय तक उसका इस्लामी कट्टरता वाला चेहरा सामने नहीं आया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1911-1913 के दौरान जिन्ना ने ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के तहत इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में एक महत्वपूर्ण कानून को पेश करने में अहम भूमिका निभाई, जिसे मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट, 1913 कहा जाता है। यह एक्ट वक्फ सम्पत्तियों से संबंधित कानूनी विवादों को सुलझाने के लिए बनाया गया था। 19वीं सदी के अंत में ब्रिटिश अदालतों और प्रिवी काउंसिल ने कई फैसले दिए, जिनमें वक्फ की वैधता पर सवाल उठे। खास तौर पर, 1894 के अब्दुल फतह बनाम सईदन मामले में प्रिवी काउंसिल ने फैसला दिया कि अगर कोई वक्फ अपने परिवार के लाभ (वक्फ-अलाल-औलाद) के लिए बनाया गया है, तो वह इस्लामी कानून के तहत वैध नहीं होगा। इस फैसले ने भारत में मुस्लिम समुदाय में चिंता पैदा की, क्योंकि पारिवारिक वक्फ उनकी परंपरा का हिस्सा थे।
इस समस्या को हल करने के लिए मुस्लिम नेताओं ने ब्रिटिश सरकार से एक नया कानून बनाने की मांग की। जिन्ना तब इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य था। उसने इस मुद्दे को जोरशोर से उठाया। 7 मार्च 1911 को यह बिल पेश किया गया, जिसे बाद में संशोधनों के साथ 1913 में पारित किया गया। यह कानून 7 मार्च 1913 को लागू हुआ। इसका मकसद था कि पारिवारिक वक्फ को कानूनी मान्यता मिले और प्रिवी काउंसिल के फैसले से सामने आया असमंजस खत्म हो। निशिकांत दुबे का दावा है कि 1954 तक इसे जिन्ना लॉ कहा जाता था, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों में कहीं भी इसका जिक्र नहीं मिलता। चूँकि यह जिन्ना के प्रयासों से आया था, इसलिए इसे जिन्ना लॉ के रूप में जोड़ा जाता है। लेकिन आधिकारिक तौर पर इसका नाम हमेशा मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट- 1913 ही रहा।
साल 1923 में मुसलमान वक्फ एक्ट 1923 पारित हुआ, जो वक्फ सम्पत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा था। आजादी के बाद भारत सरकार ने वक्फ सम्पत्तियों के बेहतर प्रबंधन के लिए 1954 में एक नया वक्फ एक्ट बनाया। इसके बाद 1995 और 2013 में इसमें संशोधन हुए और अब 2025 में वक्फ संशोधन बिल पेश किया जा रहा है। वक्फ की कहानी सिर्फ शासकों तक सीमित नहीं है। 7वीं सदी में अरब व्यापारियों ने दक्षिण भारत में इस्लाम के साथ वक्फ की परंपरा लाई। मालाबार क्षेत्र में मस्जिदें और कब्रिस्तान इसके शुरुआती उदाहरण हैं।
इतिहासकार सतीश चंद्रा की किताब मेडिएवल इंडिया के मुताबिक, दक्कन के बहमनी सल्तनत और विजयनगर साम्राज्य के बीच संपर्क में भी वक्फ का जिक्र मिलता है। स्वतंत्रता के बाद 1954 में वक्फ एक्ट आया, जिसे 1995 और 2013 में संशोधित किया गया। आज वक्फ बोर्ड के पास 9.4 लाख एकड़ जमीन है, जो इसे देश का तीसरा सबसे बड़ा जमींदार बनाती है। दो गांवों से शुरू हुआ वक्फ आज 9.4 लाख एकड़ तक पहुंच गया है। इसमें 8.7 लाख से ज्यादा सम्पत्तियां शामिल हैं। मस्जिदें, दरगाहें, कब्रिस्तान और इमामबाड़े इसके बड़े हिस्से हैं।
वामपंथी इतिहासकार इरफान हबीब की चिंता है, जिस सम्पत्ति का कोई मालिक नहीं होता, उसके सब मालिक बन जाते हैं। वक्फ के साथ भी यही हुआ। कई जगह इसका दुरुपयोग हुआ। वे कहते हैं कि लोग संशोधन बिल पर शक करते हैं कि सरकार इसके जरिए जमीनों पर कब्जा करना चाहती है। हबीब कहते हैं, वक्फ समाज के लिए बना था। इसे उसी भावना से चलाना चाहिए। मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली कहते हैं, वक्फ में कोई गैर-कानूनी कब्जा नहीं होता। यह आरोप बेबुनियाद हैं। मुसलमानों ने अपनी जमीनें दान की हैं। मौलाना खालिद कहते हैं, वक्फ इस्लाम में नमाज और हज जितना अहम है। यह 1400 साल से चली आ रही परंपरा है। लेकिन वे मानते हैं कि इसमें नीयत बदल गई है। आज वक्फ बोर्ड की ताकत और उससे जुड़े विवाद सरकार के लिए चुनौती हैं। यह संशोधन कितना कारगर होगा, यह वक्त बताएगा। लेकिन राजगोपाल जैसे लोगों का दर्द और सवाल अभी अनसुने हैं।