भ्रष्ट जजों पर एफआईआर दर्ज करने की याचिका
नोटों की बरामदगी पर सुप्रीम कोर्ट कर रही लीपापोती
याचिका में उठा सवाल: भ्रष्ट जजों को क्यों मिले कानून से छूट?
क्रॉसरः प्रयागराज ट्रांसफर किए जाने पर वकीलों ने की सांकेतिक हड़ताल
नई दिल्ली, 24 मार्च (एजेंसियां)। दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर पर आग लगने के बाद अधजले नोटों की बरामदगी मामले में विवाद गहराता जा रहा है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर एफआईआर दर्ज करने के साथ-साथ जजों को छूट से जुड़े 1991 के फैसले को भी चुनौती दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर दिल्ली पुलिस को दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित तौर पर आधी जली हुई नकदी बरामद होने के मामले में एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की गई है। इस याचिका में के. वीरस्वामी मामले में 1991 के फैसले को भी चुनौती दी गई है, जिसमें शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश की पूर्व अनुमति के बिना हाईकोर्ट या शीर्ष अदालत के किसी जज के खिलाफ कोई आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती।
नकदी बरामदगी 14 मार्च को रात करीब 11.35 बजे जज यशवंत वर्मा के लुटियंस स्थित आवास में आग लगने के बाद हुई, जिसके बाद अग्निशमन अधिकारियों को मौके पर पहुंचकर आग बुझानी पड़ी। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम और दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को जस्टिस वर्मा से न्यायिक कार्य वापस लेने समेत कई निर्देश जारी किए। मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने जांच के लिए एक आंतरिक समिति गठित की और दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय से कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा को कोई न्यायिक कार्य न सौंपा जाए। सोमवार को न्यायमूर्ति वर्मा को अगले आदेश तक पद से हटा दिया गया।
23 मार्च को अधिवक्ता मैथ्यूज जे नेदुम्परा और तीन अन्य की तरफ से दाखिल याचिका में यह भी कहा गया कि न्यायाधीशों को दी गई छूट कानून के समक्ष समानता के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन करती है और न्यायिक जवाबदेही व कानून के शासन के बारे में चिंताएं पैदा करती है। याचिका में कहा गया है, यह घोषित करना कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास से अग्निशमन बल/पुलिस की तरफ से भारी मात्रा में धन की बरामदगी की घटना भारतीय न्याय संहिता के कई प्रावधानों के तहत दंडनीय अपराध है और पुलिस का कर्तव्य है कि वह एफआईआर दर्ज करे। याचिका में 1991 की उस टिप्पणी को चुनौती दी गई थी कि मुख्य न्यायाधीश की पूर्व अनुमति के बिना किसी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जाएगा और तर्क दिया गया था कि वे पर इनक्यूरियम (देखभाल की कमी) और सब साइलेंटियो (चुपचाप) थे।
याचिका में कहा गया है कि, न्यायालय की टिप्पणी कानून की अज्ञानता और बिना इस बात पर ध्यान दिए कि पुलिस का यह वैधानिक कर्तव्य है कि जब उसे किसी संज्ञेय अपराध की सूचना मिले तो वह एफआईआर दर्ज करे और न्यायालय का उक्त निर्देश पुलिस को उसके वैधानिक कर्तव्य का निर्वहन करने से रोकने के अलावा कुछ नहीं है। याचिका में कहा गया है कि इस निर्देश ने विशेषाधिकार प्राप्त पुरुषों और महिलाओं का एक विशेष वर्ग बनाया है, जो देश के दंडात्मक कानूनों से प्रतिरक्षित हैं। याचिका में कहा गया है, कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण हमारे संविधान का मूल है। कानून के समक्ष सभी समान हैं और आपराधिक कानून सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे किसी की स्थिति, पद आदि कुछ भी हो। हमारे संवैधानिक ढांचे में एकमात्र अपवाद, यानी प्रतिरक्षा, राष्ट्रपति और राज्यपालों को दी गई है। इसमें दावा किया गया है कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के मामले में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।
इसमें कहा गया है, यह घोषित करना कि कॉलेजियम की तरफ से गठित तीन सदस्यीय समिति को 14 मार्च, 2025 को न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास पर हुई घटना की जांच करने का कोई अधिकार नहीं है, जहां आग लगने के कारण संयोग से नोटों के ढेर बरामद हुए थे, जो बीएनएस के तहत कई संज्ञेय हैं और समिति को ऐसी जांच करने का अधिकार देने वाला कॉलेजियम का संकल्प शुरू से ही अमान्य है, क्योंकि कॉलेजियम खुद को ऐसा आदेश देने का अधिकार नहीं दे सकता है, जहां संसद या संविधान ने कोई अधिकार नहीं दिया है। याचिका में दिल्ली पुलिस को एफआईआर दर्ज करने और अन्य लोगों को राज्य के संप्रभु पुलिसिंग कार्य में हस्तक्षेप करने से रोकने का निर्देश देने की मांग की गई है। याचिका में केंद्र को न्यायपालिका के सभी स्तरों पर भ्रष्टाचार को रोकने के लिए प्रभावी और सार्थक कार्रवाई करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है, जिसमें न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक, 2010 को लागू करना भी शामिल है, जो खत्म हो चुका है।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को उनके मूल न्यायालय, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वापस स्थानांतरित करने की सिफारिश करते हुए प्रस्ताव जारी किया है। वहीं इससे पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने के सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के फैसले पर आपत्ति भी जताई थी।
जज यशवंत वर्मा के दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही कहा था कि उनका ट्रांसफर एक नियमित प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है। इस ट्रांसफर का जज वर्मा के घर से मिले अधजले नोटों के विवाद से कोई लेना देना नही हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के जज के घर से भारी मात्रा में कैश की बरामदगी मामले में राजनीति भी शुरू हो गई है। अब इस मामले में तमाम विपक्षी सांसदों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। इसके साथ विपक्षी सांसदों ने निष्पक्ष जांच की मांग के साथ-साथ जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग भी चलाने की मांग की है। मामले में हुए घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए आपा के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा, यह एक बड़ा मुद्दा है, न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा टूटा है। वहीं कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश खन्ना की तरफ से गठित समिति एक कदम आगे है, उन्होंने कहा कि सरकार को इस मुद्दे पर संसद में बयान देना चाहिए। उन्होंने कहा, इस नकदी अग्निकांड की सच्चाई को सामने लाना भारत के मुख्य न्यायाधीश का कर्तव्य है।
भाकपा के पी. संतोष कुमार ने कहा कि न्यायाधीश पर महाभियोग चलाया जाना चाहिए। भारत की संसद उनके खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए कदम उठाएगी। ऐसे लोगों को (न्यायिक) मामलों के शीर्ष पर बैठे देखना दुर्भाग्यपूर्ण और चौंकाने वाला है। आजाद समाज पार्टी (एएसपी) के सांसद चंद्रशेखर ने मांग की कि न्यायिक सेवा आयोग का गठन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, हर सरकारी पद पर नियुक्ति के लिए परीक्षाएं होती हैं। फिर न्यायाधीशों के लिए क्यों नहीं? कुछ परिवारों ने संस्थान पर कब्जा कर लिया है। अब समय आ गया है कि कॉलेजियम प्रणाली को खत्म किया जाए और एक अखिल भारतीय न्यायिक आयोग बनाया जाए।
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार देर रात न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास पर कथित रूप से भारी मात्रा में नकदी मिलने की आंतरिक जांच रिपोर्ट अपनी वेबसाइट पर अपलोड की, जिसमें फोटो और वीडियो भी शामिल है। 25 पन्नों की जांच रिपोर्ट में हिंदी में दो संक्षिप्त नोट हैं, जिसमें उल्लेख किया गया है कि 14 मार्च को न्यायमूर्ति वर्मा के आवास के स्टोररूम में लगी आग को बुझाने के बाद, चार से पांच अधजले बोरे मिले, जिनमें नोट भरे हुए थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि शॉर्ट-सर्किट के कारण आग लगी। वहीं पुलिस आयुक्त संजय अरोड़ा द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय के साथ साझा किए गए वीडियो में दिल्ली अग्निशमन सेवा (डीएफएस) के अग्निशमन कर्मी उन वस्तुओं की आग बुझाते हुए दिखाई दे रहे हैं जिनमें संभवतः आधे जले हुए भारतीय नोट भी शामिल हैं।
कर्नाटक में न्यायाधीशों को हनीट्रैप में फंसाने का मामला भी अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। मामले में शीर्ष अदालत के समक्ष एक याचिका लगाई गई है और आरोपों की सीबीआई या एसआईटी से जांच की मांग की गई है। कर्नाटक में न्यायाधीशों और लोक सेवकों को हनीट्रैप में फंसाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में आरोपों की सीबीआई या एसआईटी से जांच की मांग की गई है। याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका पर तत्काल सुनवाई करने की मांग की। बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट याचिका को आज या कल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमत है।
चार दिन पहले कर्नाटक सरकार के सहकारिता मंत्री केएन राजन्ना ने विधानसभा में दावा किया था कि केंद्रीय नेताओं समेत 48 राजनेता हनी ट्रैप में फंस गए हैं। राजन्ना ने कहा था कि कर्नाटक को सीडी और पेन ड्राइव फैक्ट्री कहा जा रहा है। पता चला है कि 48 लोगों की सीडी-पेन ड्राइव उपलब्ध हैं।नेटवर्क पूरे भारत में फैला है। कई केंद्रीय मंत्री भी फंसे हैं। अन्य विधायकों ने भी मंत्री राजन्ना के बयान का समर्थन किया था। इसके बाद राज्य के गृह मंत्री जी परमेश्वर ने इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने का आश्वासन दिया। इस मामले में गृह मंत्री जी परमेश्वर ने कहा था हमें बस इतना पता है कि हमारी खुफिया एजेंसियों ने सैन्य खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर दीप राज चंद्र नामक व्यक्ति को कुछ जानकारी दी थी। पता चला कि वह पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के साथ हाल की घटनाओं और उपकरणों के रहस्यों के बारे में गोपनीय जानकारी साझा कर रहा था। अब सैन्य खुफिया एजेंसियां इस मामले को आगे ले जाएंगी।
इसे लेकर विपक्ष ने जांच की मांग की। भाजपा विधायक और विधानसभा में विपक्ष के नेता आर अशोक ने कहा कि यह किसी एक पार्टी का मुद्दा नहीं है। यह लोगों के लिए काम करने वाले विधायकों के खिलाफ सबसे बड़ी साजिश है। कुछ लोग अपने छिपे हुए एजेंडे के तहत ये सब (हनीट्रैप) कर रहे हैं। भाजपा विधायक बासनगौड़ा पाटिल ने राज्य के गृह मंत्री डॉ जी परमेश्वर से मांग की कि हनीट्रैप मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए ताकि इसकी निष्पक्ष जांच हो सके। उन्होंने इसे लेकर गृह मंत्री को पत्र लिखा है।
जस्टिस यशवंत वर्मा का तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट करने के विरोध में हाईकोर्ट के अधिवक्ताओं ने आज सांकेतिक हड़ताल की। सभी अधिवक्ता सोमवार को आधे दिन तक न्यायिक कार्य से विरत रहे। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की लंच के बाद हुई बैठक में हड़ताल पर रहने का फैसला लिया गया। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से बुलाई गई आकस्मिक आमसभा में न्यायमूर्ति के बंगले से कथित रूप से जले हुए नोट मिलने के मामले की ईडी व सीबीआई से जांच कराने की मांग की। साथ ही प्रस्ताव पारित कर कहा कि महाभियोग चलाया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने आम सभा में प्रस्ताव पारित कर न्यायमूर्ति का स्थानांतरण इलाहाबाद करने का कड़ा विरोध किया। प्रस्ताव में कहा गया कि मुख्य न्यायाधीश को सीबीआई, ईडी व अन्य जांच एजेंसियों को एफआईआर दर्ज करने और जांच करने की अनुमति देनी चाहिए। कॉलेजियम के माध्यम से न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। ऐसे में योग्य और सक्षम व्यक्तियों का चयन नहीं हो पाता है। मुख्य न्यायाधीश को कॉलेजियम प्रणाली पर विचार करना चाहिए। हाईकोर्ट में रिक्त पदों को यथा शीघ्र भरा जाए। अंकल जज सिंड्रोम के खिलाफ भी प्रस्ताव पारित किया गया। कॉलेजियम से इस ओर ध्यान देने की मांग की गई। प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीशों को भेजने का फैसला लिया गया।